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unheeding    
a. 不小心的,不注意的,不理会的

不小心的,不注意的,不理会的



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  • विश्राम - विक्षनरी
    शांति । आराम । चैन । सुख । स्वस्थता । उ॰— कोउ विश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिन । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिय ।—तुलसी (शब्द॰) ।
  • चैतन्य में विश्राम कैसे करें? सुनें और समझें।
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  • Hindi English (हिंदी इंग्लिश) - Translation and Meanings - ShabdKhoj . . .
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  • विश्राम - Wiktionary, the free dictionary
    Synonyms: आराम (ārām), फ़राग़त (farāġat) घर पहुँचकर हमने एक घंटा विश्राम किया। ghar pahũckar hamne ek ghaṇṭā viśrām kiyā Upon reaching home, we took an hour's rest
  • चैतन्य का अर्थ - चैतन्य अर्थ
    विशेषण चेतना से भरा हुआ या जिसमें चेतना हो:"लोगों द्वारा मृत समझे जाने वाले व्यक्ति को देखने के बाद चिकित्सक ने बताया कि वह चैतन्य है"
  • चैतन्य - जैनकोष
    Special pages Printable version Permanent link Page information Recent changes Help Create account Log in जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च
  • चैतन्य महाप्रभु - विकिपीडिया
    यह अठारह शब्दीय (३२ अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। [2] जब ये कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। सन १५१० में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया। मात्र २४ वर्ष की आयु में ही इन्होंने गृहस्थ आश्रम का त्याग कर सन्यास ग्रहण किया। [2] बाद में ये चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रख्यात हुए। सन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे, तब भगवान की मूर्ति देखकर ये इतने भाव-विभोर हो गए, कि उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, व मूर्छित हो गए। [2] संयोग से तब वहां उपस्थित प्रकाण्ड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की प्रेम-भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्र-चर्चा आरंभ हुई, जिसमें सार्वभौम अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने लगे, तब श्रीगौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध किया व उन्हें अपने षड्भुजरूपका दर्शन कराया। सार्वभौम तभी से गौरांग महाप्रभु के शिष्य हो गए और वह अन्त समय तक उनके साथ रहे। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने गौरांक की शत-श्लोकी स्तुति रची जिसे आज चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है। [2] उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट, गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव ने इन्हें श्री कृष्ण का अवतार माना और इनका अनन्य भक्त बन गया। [8]





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